मुश्किल वाला प्यार
उसकी हालत से मज़ा लेते हुए आतिफ ने एक एक लफ्ज़ पर जोर देते हुए कहा।
"क . . . क्या मतलब?" इस बार आतिफ की बात पर नूर के होश उड़ गए थे। उसकी पैर कांपने लगे थे गुस्से की शिद्दत में इस मुआमले की इतनी नाजुकी के बारे में तो उसने सोचा ही न था। और अब जब सोचा तो पूरी शिद्दत से कांप उठी थी।
“मतलब यह कि तुम्हारे पास दो दिन हैं फैसला करने के लिए। अगर इन दो दिनों में' तुम्हें फैसला करना है कि क्या तुम्हें उम्र भर के लिए मेरा साथ मन्जूर है या नहीं। दो दिन बाद मैं अपने पेरेन्टस को दोबारा तुम्हारे घर भेजूंगा। अगर तुम्हारा जवाब हां हुआ तो इन फोटो की कहानी सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही रहेगी और अगर जवाब पहले दो बार की तरह इस बार भी न हुआ तो नतीजे में इन फोटो को न सिर्फ प्रोफेसर साहब तक पहुंचा दूंगा बल्कि जो मेरे जहन में आएगा मैं करूंगा।" आतिफ ने मज़बूत अन्दाज़ में एक एक लफ्ज़ पर जोर देते हुए वार्निंग भरे लहजे में कहा था।
कुछ देर नूर के सुते हुए परीशान चेहरे को गौर से देखने के बाद वह दोबारा बोला- “तुम खुद सोचो कि जब प्रोफेसर साहब के सामने यह फोटो जाएंगी तो तुम्हारा वह इमेज और किरदार उनकी नजरों
में कितना खराब हो जाएगा। यह तुम मुझसे बेहतर सोच सकती हो । एक पल के लिए सोचो जब उन्हें यह पता चलेगा कि उनकी लाडली बेटी जो शख्सियत और किरदार की उस ऊंचाई पर है जहां से उनका सर फख से बलन्द होता था जो उनके फख और घमन्ड की वजह थी वही बेटी एक ऐसे रास्ते पर चल निकली थी जिसके बारे में सोच कर वह खुद अपनी नज़रों में शर्मसार हो जाएंगे। तुम उनकी नज़रों से गिर जाओगी।" आने वाले वक्त की सितमगर हकीकत से वह नूर को आगाह कर रहा था।
और उसकी कही गई एक एक बात नूर को जिल्लत का शदीद एहसास उसके अन्दर तक समा गया था। वह एक ऐसी गेम का हिस्सा बन गई थी जिसके बारे में उसने कभी न सोचा था।
"तुम . . . तुम घटिया,नीच धोकेबाज़ इन्सान! मैं... मैं आज ही जाकर तुम्हारी हक़ीक़त से बाबा जान को खबर कर दूंगी।" नूर ने गुस्से से कहा था मगर न जाने क्या बात थी कि ऐसा करते हुए उसका
लहजा एकदम ही धीमा हो गया था।
"वाई नाट, शौक़ से । इस वक्त गेंद तुम्हारे कोर्ट में है इसलिए तुम्हें जो बेहतर में लगता है वह तुम कर लो। हां मगर जब गेंद मेरे कोर्ट में आएगा तो जो मुझे बेहतर लगेगा वह मैं कर लूंगा। ओ.के, सी य अगेन जान ।" आतिफ वार्निंग भरे लहजे में कहता लापरवाई से आगे बढ़ गया।
जबकि शल होते ज़हन वदिल के साथ वह वहीं खड़ी तकदीर के इस वार के बारे में सोचती रही।
बहुत दिन बाद फिर ऐसा हुआ है कि हमसे आइना रूठा हुआ है हमारे होने के इमकां से आगे न होने का खला फैला हुआ है तुम्हारे जीत जाने से ज्यादा हमारी हार का चर्चा हुआ है वह बेड पर दोनों घुटनों में सर दिए बैठी थी। सोच सोचकर उसका दिमाग शल हो गया था मगर इस मसअले के हल के लिए कोई सिरा उसके हाथ न आ रहा था। पिछले चौबीस घन्टों से उसकी यही हालत थी। अपने इतने चाहने वाले बाबा को वह । कोई दुख, कोई तकलीफ़ देने का सोच भी नसकती थी। फिर बदनामीव रुसवाई की इस जिल्लत को देखने के बाद तो शायद वह जिन्दा ही न रह पाएं। अगर वह बाबा जान को आतिफ की हरकत के बारे में सब कुछ सच सच बता भी देती तो न जाने आतिफ उन फोटो के जरीये क्या कुछ कर देता।
उसकी जात एक अजीब सी परीशानी में फंस कर रह गई थी। मर्दो की ज़ात से नफ़रत करते करते आखिर आज वह खुद भी ऐसे ही एक मर्द के चुंगल में फंस गई. थी। उसे उस वक्त आतिफ खान से शदीद नफ़रत महसूस हो रही थी। सारी रात वह एक पल के लिए भी न सो पाई थी। सारी रात करवटें बदलते निकल गई । दिल अनजानी परीशानी और खौफ क्री जगह बन चुका था। उसने तमाम फ़ोटोज़ के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे मगर दिल को किसी तौर सुकून न आ रहा था।
“क्या सोचेंगे बाबा जान मेरे बारे में जब वह फोटो उनके सामने आएगीतो।" उसके दिलकी हार्ट बीट यह सब सोच सोच कर बुरी तरह डिस्टर्ब हुई थी और उससे
आगे वह कुछ न सोच सकी। हर गुजर पल के साथ उसकी परीशानी व बेचैनी में इजाफा होता जा रहा था। जब सोच सोच कर थक जाती तो बेइख्तियार रोने लगती । आज वह यूनीवर्सिटी भी न गई थी और अपने कमरे में बन्द सुबह से वह न जाने कितनी बार रो चुकी थी।
"क्या बात है नूर! आज तुम सुबह से ही कमरे में बन्द हो? तबीअत तो ठीक है ना तुम्हारी?" वह उन्हीं सोचों में गुम थी जब सलमा बेगम ने दरवाजा खोल कर झांकते हुए पूछा।
“जी जी ... जी फुप्फो! मैं बिल्कुल ठीक हूं। बस ज़रा सर में दर्द था इसलिए।" लहजे और आंखों की नमी पर काबू पाते हुए उसने जवाब दिया और फिर जल्दी से दोनों हाथों की हथेली से चेहरा साफ कर लिया।
"तो मुझे बतातीं बेटा! मैं तुम्हारे लिए चाय बना लाती।" उन्होंने बेड पर उसके सामने बैठते हुए कहा।
"अरे नहीं फुप्फो! आपको पता है ना कि मैं ज्यादा चाय नहीं पीती।"नूर ने मना किया फिर बोली- “फुप्फो! मैंने पेन किलर ली है मगर पता नहीं क्यों आराम नहीं आ रहा।" उसने दोनों हाथों से अपनी कनपटियों को दबाते हुए जवाब दिया।
"दर्द क्यों नहीं होगा, दिन रात जो पढ़ाई में लगी रहती हो । हाल देखो अपना तुमने क्या कर लिया है । सूख कर कान्टा होती जा रही हो। ऊपर से ठीक से कुछ खाती पीती भी नहीं। आओ मैं तुम्हारे सर में तेल की मालिश कर देती हूं। अजीब लड़की हो।न खाने का होश होता है और न पीने का,न सोने की फिक्र होती है न जागने
की।" सलमा बेगम जो एक बार शुरू हुयीं तो मुश्किल से रुकीं । और फिर नूर के ना - ना करने के बावुजूद उसे सामने बिठा कर तेल की मालिश करने लगीं।
"एक बात तुमने नोट की नूर ?" कमरे में कुछ देर की खामोशी को सलमा बेगम ने तोड़ते हुए कहा।
"क्या बात फुप्फो?" अपनी सोचों और उलझनों में गुम नूर ने चौंक कर पूछा।
"भाई जान पहले से ज्यादा खामोश रहने लगे हैं। कुछ उलझे उलझे से, कुछ परीशान पता नहीं क्या बात है। मुझसे भी ज्यादा बातें नहीं कर रहे है , अपने में ही घुटते जा रहे हैं । मुझे लगता है कि तुम्हें उनसे बात करनी चाहिए " तेल का मसाज करती उनकी उंगलियां थोड़ी देर' को रुकी थीं यूं जैसे कोई सिरा ढून्ड रही हों।
4 “शायद साहिरा आपा की याद परीशान कर रही होगी।" नूर ने कुछ सोच कर जवाब दिया।
“पता नहीं साहिरा की याद परीशान कर रही है उन्हें या हर आने वाले रिश्ते से तुम्हारा किया जाने वाला इन्कार उन्हें परीशानी में डाल रहा है।" उन्होंने अन्दाजा करते हुए कहा फिर गहरी सांस छोड़ते हुए दोबारा बोलीं- “कुछ तो है जो उन्हें अन्दर ही अन्दर घुन की तरह खाए जा रहा है।"
सलमा बेगम की बातों ने नूर को नए सिरे से तकलीफ़ और परीशानी में डाल दिया था
Anjali korde
15-Sep-2023 12:05 PM
Very nice
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Babita patel
15-Sep-2023 10:24 AM
Nice
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hema mohril
13-Sep-2023 08:41 PM
Fantastic
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